Petrol Diesel Rate Today: पिछले कुछ समय से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों को लेकर आम जनता के बीच लगातार चर्चा बनी हुई है। हर कोई जानना चाहता है कि क्या नई GST दरों या हालिया नीतिगत फैसलों के चलते वास्तव में ईंधन सस्ता हुआ है या नहीं। बढ़ती महंगाई के दौर में ईंधन की कीमतों में थोड़ी-सी भी राहत लोगों के बजट पर बड़ा असर डालती है। हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर घरेलू स्तर तक ऐसे संकेत मिले हैं, जिनसे यह उम्मीद जगी है कि आम उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सकती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की चाल
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में हाल के हफ्तों में नरमी देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड ऑयल, जो भारत में ईंधन कीमतों का प्रमुख आधार माना जाता है, कुछ समय पहले जहां ऊंचे स्तर पर बना हुआ था, वहीं अब इसमें गिरावट दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन, वैश्विक आर्थिक गतिविधियां और भू-राजनीतिक घटनाएं कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित करती हैं।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला हर बदलाव सीधे तौर पर देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर असर डालता है। जब वैश्विक स्तर पर तेल सस्ता होता है, तो तेल विपणन कंपनियों के पास घरेलू कीमतों में कटौती करने की गुंजाइश बनती है।
घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल के दामों में बदलाव
अंतरराष्ट्रीय बाजार से मिले सकारात्मक संकेतों का असर देश के विभिन्न शहरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी दिखाई देने लगा है। कई राज्यों और शहरों में प्रति लीटर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में मामूली कटौती दर्ज की गई है। यह कमी भले ही एक या डेढ़ रुपये प्रति लीटर तक सीमित हो, लेकिन रोजमर्रा के खर्चों में इसका असर महसूस किया जा सकता है।
महानगरों की बात करें तो दिल्ली में पेट्रोल की कीमत अब पहले के मुकाबले कुछ कम होकर मध्य-नब्बे रुपये के आसपास आ गई है, जबकि डीजल की दरें भी अस्सी के ऊपरी स्तर पर बनी हुई हैं। मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में अभी भी पेट्रोल की कीमतें अपेक्षाकृत अधिक हैं, लेकिन वहां भी पहले के मुकाबले थोड़ी राहत जरूर मिली है।
अलग-अलग राज्यों में कीमतों का अंतर क्यों?
देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक समान नहीं होतीं। इसका मुख्य कारण केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले कर हैं। केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क लगाती है, जबकि राज्य सरकारें वैट और अन्य स्थानीय कर वसूलती हैं। यही वजह है कि किसी राज्य में पेट्रोल सस्ता मिलता है तो किसी में महंगा।
उदाहरण के तौर पर उत्तर भारत के कुछ शहरों में ईंधन की कीमतें अपेक्षाकृत कम हैं, जबकि पूर्वी और पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में यह अधिक देखने को मिलती हैं। परिवहन लागत और स्थानीय प्रशासनिक शुल्क भी इस अंतर को बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं।
रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में राहत
सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में भी हाल के समय में कुछ नरमी देखने को मिली है। 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत कई शहरों में पहले के मुकाबले कम हुई है। महानगरों में यह कीमत नौ सौ से एक हजार रुपये के बीच बनी हुई है, जबकि छोटे शहरों में इसमें थोड़ा अंतर देखने को मिलता है।
रसोई गैस की कीमतों में यह राहत खासतौर पर उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनका घरेलू बजट पहले से ही महंगाई के दबाव में है। गैस सिलेंडर सस्ता होने से रसोई खर्च में सीधी बचत होती है।
उज्ज्वला योजना से मिल रही अतिरिक्त मदद
सरकार की उज्ज्वला योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को रसोई गैस सिलेंडर पर सब्सिडी दी जा रही है। इस योजना के अंतर्गत मिलने वाली सहायता से गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को बड़ी राहत मिलती है। सब्सिडी के बाद एक सिलेंडर की प्रभावी कीमत काफी कम हो जाती है, जिससे स्वच्छ ईंधन का उपयोग करना अधिक आसान हो जाता है।
यह योजना खासतौर पर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए फायदेमंद साबित हुई है। महिलाओं पर घरेलू खर्च का बोझ कम करने और स्वास्थ्य की दृष्टि से स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने में इस योजना की अहम भूमिका रही है।
सरकार और कर नीतियों का असर
ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने में सरकारी नीतियों की भूमिका बेहद अहम होती है। हाल के समय में केंद्र और कुछ राज्य सरकारों ने करों में मामूली कटौती की है, जिसका असर सीधे तौर पर खुदरा कीमतों पर पड़ा है। त्योहारी सीजन को ध्यान में रखते हुए लिया गया यह फैसला लोगों के लिए राहत लेकर आया है।
हालांकि, यह भी सच है कि पेट्रोल और डीजल अभी भी पूरी तरह GST के दायरे में नहीं आते। अगर भविष्य में इन्हें GST में शामिल किया जाता है, तो कीमतों में और अधिक पारदर्शिता और संभावित कमी देखने को मिल सकती है। फिलहाल सरकार कर संतुलन बनाए रखते हुए उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश कर रही है।
अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी का असर सिर्फ वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव पड़ता है। परिवहन लागत घटने से रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर दबाव कम होता है। व्यापार और उद्योग जगत को भी इससे राहत मिलती है, जिससे आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद रहती है।
कृषि क्षेत्र में डीजल सस्ता होने से किसानों को भी फायदा होता है, क्योंकि सिंचाई और कृषि कार्यों में ईंधन की अहम भूमिका होती है। कुल मिलाकर, ईंधन की कीमतों में स्थिरता महंगाई को नियंत्रित करने में मददगार साबित होती है।
आगे क्या उम्मीद की जा सकती है?
भविष्य में पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतें किस दिशा में जाएंगी, यह काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा। अगर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहती हैं, तो घरेलू बाजार में भी राहत बनी रह सकती है। वहीं, किसी बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम या आपूर्ति संकट की स्थिति में कीमतों पर दबाव फिर से बढ़ सकता है।
सरकार के लिए दीर्घकालिक समाधान वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है। इलेक्ट्रिक वाहन, बायोफ्यूल और अन्य स्वच्छ ऊर्जा विकल्प भविष्य में पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
आम नागरिकों के लिए जरूरी सलाह
उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे रोजाना ईंधन की कीमतों पर नजर रखें और अपने खर्च की योजना उसी अनुसार बनाएं। वाहन का सही रखरखाव, संतुलित ड्राइविंग और सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करके ईंधन खर्च को कम किया जा सकता है। छोटी-छोटी सावधानियां लंबे समय में बड़ी बचत में बदल सकती हैं।
कुल मिलाकर, हालिया बदलावों से यह जरूर कहा जा सकता है कि पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में कुछ हद तक राहत मिली है। हालांकि यह राहत कितने समय तक बनी रहेगी, इसका फैसला आने वाला समय और वैश्विक बाजार की परिस्थितियां करेंगी।















